कार्यों का शरीर और मन पर प्रभाव
कार्यों का शरीर और मन पर प्रभाव
व्यक्ति के सोचने एवं कार्य करने के ढंग का उसके जीवन की सफलता और असफलता पर व्यापक प्रभाव पड़ता है । इसीलिए सभी धर्मों की मुख्य सीख यही है कि ' जैसा करोगे , वैसा ही भरोगे । ' ' जैसा बोओगे , वैसा ही काटोगे । ' ऐसा कहने का केवल धार्मिक आधार ही नहीं है । इसका वैज्ञानिक आधार भी है ।
जब भी कोई व्यक्ति किसी का बुरा करता है या सोचता है , छल - कपट के कार्य करता है , तो उसका रक्तचाप और दिल की धड़कन एकाएक बढ़ जाती है । जब व्यक्ति बार - बार वैसा ही करता रहता है , तो रक्तचाप और दिल की धड़कन को बढ़े रहने की आदत पड़ जाती है । इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति के अंदर किसी न किसी रोग का जन्म हो जाता है
क्रोध , लोभ , भय , ईर्ष्या द्वेष , चिंता एवं तनाव का भी ऐसा ही प्रभाव पड़ता है । ये सभी हमारे अंदर के रासायनिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं ।
पिट्यूटरी एवं एड्रीनल ग्रंथियां उस संतुलन को बनाए रखने का प्रयास करती रहती हैं । इस कार्य में उन्हें अधिक से अधिक हारमोन - रस छोड़ना पड़ता है । ये ग्रंथियां कुछ सीमा तक तो ऐसा करती हैं , किंतु यदि वह व्यक्ति उन बुराइयों को करता ही रहता है , तो ये ग्रंथियां भी हार मान लेती और अतिरिक्त हारमोन रस छोड़ने का अपना प्रयास बंद कर देती हैं । बढ़े हुए रक्तचाप कारण दिल की धमनियों की लचक धीरे - धीरे घटने लगती है , जिससे दिल से रक्त ले जाने वाली रक्त नलिकाएं कठोर होने लगती हैं । इस कारण दिल के रोग और अलसर आदि रोग होने के आसार बढ़ जाते हैं । कई प्रकार के दूसरे रोग भी शरीर में हो जाते हैं , जो धीरे - धीरे व्यक्ति के जीवन को घुन की तरह अंदर से खोखला करने लगते हैं ।
क्योंकि ये परिवर्तन दिखाई नहीं देते हैं , इसलिए लोग इनकी ओर कोई ध्यान ही नहीं देते । थोड़े से झूठे सुख के लोभ में अपना अमूल्य जीवन नष्ट करते रहते हैं । परिणाम यह होता है कि कई प्रकार के मनोकायिक रोग ( मन के विकारों के परिणाम शरीर पर रोग के रूप में उभरने लगते हैं , जैसे दमा , खुजली , सिर दर्द , एग्जिमा आदि । ) उनको घेरने लगते हैं ।
इस तरह से प्रकृति बुरे कर्मों की सजा देती रहती है और ' जैसी करनी , वैसी भरनी ' कहावत को सही सिद्ध करती है ।
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